इस कश्मीरी लड़की ने बताया विवादित कश्मीर में लड़की औरत कैसे बनती हैं

इस कश्मीरी लड़की ने बताया विवादित कश्मीर में लड़की औरत कैसे बनती हैं
ये लेख सारा अहमद (बदला हुआ नाम) ने लिखा है. सारा कश्मीर की रहने वाली हैं और फिलहाल कश्मीर में पढ़ाई कर रही हैं. वो 10 साल पहले खुद के साथ हुए एक भयावह वाकये को याद कर रही हैं.

साल 2006 की बात है, अपने कम्पटीशन के एग्जाम की तैयारी करने के लिए मैं सुबह-सुबह उठ जाती थी. 6 बजे तक मैं अपना बिस्तर छोड़ देती थी.

किताबें खोलने के पहले मैं आलस में खिड़की के बाहर देखा करती थी. मेरी आंखें सेब के बागों को ताका करतीं. उनके पीछे एक छोटी सी नदी बहती थी, जिसे देखकर ऐसा लगता था कि हरियाली में बड़ा सा सांप रेंगते हुए चला जा रहा है. उसके भी पीछे पीर पंचाल के पहाड़ थे. रौशनी से भरा आसमान नज़ारे की खूबसूरती और बढ़ा देता.

तब मैं महज 17 साल की थी.

इस नजारे को देखना ही मुझे उम्मीद से भर देता था. मुझे सभी चुनौतियों से लड़ने की ताकत देता था.

सुबह से शाम तक मैं अपने कमरे में बैठी रहती. बीच-बीच में ब्रेक लेती, फिजिक्स के उबाऊ फ़ॉर्मूले पढ़ती रहती, डाइजेस्टिव सिस्टम का डायग्राम बनाती, केमिस्ट्री के सवाल हल करती. मेरा कमरा, जो नीले रंग में पुता हुआ था, एक बड़ी लकड़ी की अलमारी का घर भी था. और ये अलमारी मेरे नन्हे राज छिपाकर रखती थी.

काल्पनिक तस्वीर

जब भी मैं किताबों से ऊब जाती थी, मैं अलमारी में लगे शीशे को देखने लगती थी. शीशे के सामने लगे शेल्फ में रखे कॉस्मेटिक्स एक-एक कर लगाती. इतना पोत लेती कि भोंदू लगने लगती. कभी-कभी बस सुंदर दिखने को जी चाहता. कभी बस खुद को आईने में देख हंसती रहती. 17 साल की एक लड़की की ये हरकतें मुझे खुश रखतीं. उन दिनों, मेरा कमरा ही मेरी दुनिया थी.

मगर जुलाई की एक सुबह मेरी ज़िन्दगी बदलने वाली थी. मेरी जिंदगी जो दक्षिणी कश्मीर के शोपियन नाम के इलाके में कट रही थी. मुझे पता चलने वाला था कि विवादित कश्मीर में एक लड़की ‘औरत’ कैसे बनती है.

मौसम में हरारत थी, पहाड़ों के पीछे से गर्म, धधकते सिक्के जैसा सूरज निकल रहा था. मैं गहरी नींद में थी जब मां ने मेरा दरवाजा खटखटाया.

मां ने बंद मुट्ठियों से जोर जोर से दरवाजा पीटना चालू कर दिया. ये इस बात का संकेत था कि कुछ बुरा होने वाला है. मैंने आधी नींद में उठकर दरवाजा खोला. मां को देखकर लगा कि वो जल्दी में है और परेशान है.

‘आर्मी वालों ने पूरे गांव में उथल पुथल कर दी है’, मां ने बताया. उसकी आंखों में बेचैनी दिख रही थी. ‘एक काम करो, फिरन पहन लो.’

फिरन एक लंबा कश्मीरी गाउन होता है, जिसे सर्दियों में पहना जाता है. वजह ये थी कि फिरन में गहरी, बड़ी जेबें होती हैं. मां को डर था कि आर्मी वाले हमारे गहने या पैसे न ले जाएं. और ये डर बेवजह नहीं था. मैंने कुछ ऐसे वाकयों के बारे में सुना था जब फौजियों ने घरों से जेवर ले लिए थे.

सोने की अंगूठी और जेवरों के अलावा मैंने अपनी सस्ती झुमकियां भी फिरन की जेब में डाल लीं. गर्मी का मौसम था और फिरन में मुझे खूब गर्मी लग रही थी.

अंततः सर पर काले कपड़े बांधे फौजी आ ही गए. उन्होंने घर के पुरुषों को घर के बाहर रुकने के निर्देश दिए. मेरे अब्बा और दो भाई घर के बाहर चले गए. पड़ोस के पुरुषों के साथ उन्हें एक कतार में खड़ा कर दिया गया. वहां उनकी पहचान की जा रही थी. ये देखने के लिए कि उनमें से किसी का संबंध आतंकियों से तो नहीं है.

मैं और मां अब घर में अकेले बचे थे. हमारा घर पुराना था, जो दादी के नाम था. घर की एक खिड़की बाहर वाले बरामदे की ओर खुलती थी. खिड़की से घर में घुसने वाला कोई भी व्यक्ति दिख जाता था. मेरी दादी, जिनका चेहरा झुर्रियों से सजा हुआ था, हमेशा एक सफ़ेद स्कार्फ पहने उसी खिड़की पर बैठी रहती थीं. वहां से सबपर नजर रखती थीं. वो सुपरवाइजर की तरह थीं, मुझे और अब्बा को बताती रहतीं, क्या कैसे करना है. मौत के पहले दादी जिस खिड़की पर बैठा करती थीं, मैं वहीं पर बैठी थी.

अचानक आर्मी वाले हमारे बरामदे में आ धमके. वो दो मोहल्ले के लड़कों के साथ थे. जब भी आर्मी वाले इस तरह लोगों के घरों में सर्च के लिए जाते, हमेशा स्थानीय लड़कों को साथ ले जाते. उन्हीं लड़कों के साथ वो अंदर घुसे. मैं बहुत डरी हुई थी, क्योंकि मुझे मालूम था कि अगर कोई लड़ाई होती है, तो सबसे पहला शिकार यही लड़के बनेंगे. आर्मी वालों के लिए मानों लोकल लोगों और आतंकियों के बीच कोई फर्क ही नहीं था.

जैसे ही आर्मी वाले लड़कों के साथ अंदर घुसे, लड़के आंखों से बातें करने लगे. उनकी आंखों में देखकर पता चल रहा था कि वो असहाय महसूस कर रहे हैं. उन्होंने आंखों से इशारा किया कि अब घर की तलाशी ली जाएगी. हमने उन्हें अंदर आने की इजाज़त दी.

ठक-ठक करते अपने बूट में फौजी में दादी के कमरे में घुस गए. मैं कमरे के ठीक बाहर खड़ी थी और अंदर जो भी हो रहा था, देख पा रही थी.

अचानक उन्होंने किताबें खंगालनी शुरू कर दीं. एक ऊंचे शेल्फ पर किताबें करीने से लगी हुई थीं. उन्होंने उन्हें नीचे गिरा दिया. इन किताबों में से अधिकतर धार्मिक थीं. इन्हीं में क़ुरान भी रखी थी.

मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं समझ नहीं पाई कि किताबों को नीचे फेंककर क्या हासिल हुआ. क्या वो महज हमें तंग करना चाह रहे थे. क्या वो सचमुच कुछ खतरनाक खोज रहे थे. नहीं, बस वो चाहते थे हम खीज उठें.

मैंने एक से कहा, ‘हम किताबों में क्या छिपाएंगे? आपको लगता है किताबों में हम हथियार रख सकते हैं?’
उसके कोई जवाब नहीं दिया.

मैं खुद को रोक नहीं सकी. मैंने कहा, ‘आप ये सब क्यों कर रहे हैं, इससे आपको क्या मिलेगा?

उसने किताबें छोड़ दीं. गुस्से से मेरी ओर देखा. मैं बहुत डर गई. उस फौजी की धमकी भरी आंखों ने मेरे शरीर में सिहरन पैदा कर दी.

मेरी मां ने मुझे खूब डांटा. उन्हें मालूम था कि फौजी से लड़ने का अंजाम कुछ भी हो सकता है. मोलेस्टेशन से लेकर मौत तक. भगवान के बाद अगर कश्मीर में कोई सबसे ज्यादा शक्तिशाली था, तो वो बंदूकधारी फौजी था. आज भी है. मेरी मां को उसकी ताकत का खूब अंदाज़ा था.

दादी के कमरे से निकलकर उन्होंने सभी कमरों की तलाशी ली. फिर वो मेरे कमरे में घुसे. मेरी छोटी सी दुनिया में.

पूरा घर खोज लेने के बाद वो घर से निकल गए. जाते जाते उस फौजी ने मुझे सख्त नजरों से घूरा जिससे मेरी बहस हुई थी. जानवरों सी सख्ती थी कुन आंखों में. ऐसा लगा वो मुझे मार डालेगा.

उनके जाने के बाद मैं आने कमरे में घुसी.

मैं भौंचक्की रह गई. मेरा दिल जोर से धड़क रहा था और आंखें गुस्से में लाल हो चुकी थी.

उन लोगों ने मेरे ब्रा दीवार और कपड़ों वाले हुक पर टांग दिए थे. उन्होंने अलमारी से सभी ब्रा निकाल लिए थे. कुछ पर्दों की रॉड पर लटक रहे थे, कुछ पंखे पर. पूरे कमरे में जहां भी टांगने की जगह मिली, उन्होंने मेरी पैंटीज टांग दी थीं. मेरे सेनेटरी पैड पूरे कमरे में बिखरे हुए थे. मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि कुछ समय के लिए मेर सोचने समझने की शक्ति ही ख़त्म हो गई.

उन्होंने मेरी वो अंगूठी तोड़ दी थी जो मेरे अंकल ने मझे मेट्रिक पास करने पर दी थी. उन्होंने उसे चुराया नहीं, बल्कि टुकड़े टुकड़े कर दिए थे. उसके बगल में एरा चश्मा था जिसे तोड़ दिया गया था. सैनिकों ने मेरी अलमारी से सभी कपड़े निकालकर पैरों से कुचले थे. किताबें फाड़ दी थीं. कॉस्मेटिक की शीशियां तोड़ दी थीं.

उन्हें औरतों के बारे में खूब जानकारी होगी. होगी ही, उन्हें सरकार से अधिकार जो मिला हुआ है हर औरत की दुनिया में घुसने का. अलमारिओं और दराजों को खोलकर उन्होंने एक युवा लड़की के सभी राज़ खोल दिए थे. वो राज़ जो वो सिर्फ अपनी कुछ सहेलियों को बताती है. मुझे अपने अंतर्वस्त्र बिखरे देखकर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई, कि लगा किसी ने मेरा रेप करने की कोशिश की है. मैं टूट गई. रोती रही. सरकारी हिंसा को मैंने कभी इतने करीब से नहीं देखा था. गुलामी और असहाय होने का मतलब क्या होता है, मुझे आसमान सा साफ़-साफ़ समझ में आ रहा था.

ये सिर्फ एक अनुभव है जो कई युद्धों से टूट चुकी कश्मीरी औरतों की हालत बयां करता है. ऐसे कई अनुभव हैं औरतों के पास. लगातार हो रही हिंसा में औरतों को कितनी तकलीफ होती है, इस बारे में कोई बात नहीं करता. घरों के अंदर, दीवारों के अंदर जो औरतें सहती हैं वो हिंसा है. एक फौजी की आवाज, उसकी बातें, उसक आंखें, उसको सहन करती हैं. विवादित कश्मीर में एक औरत होना आसान नहीं है.

असभ्य भारतीय सैनिकों के हाथों इतना सताए जाने के बाद भी हमारी इच्छाशक्ति ख़त्म नहीं हुई है.

जब-जब इस भयानक वाकये की याद आती है, मैं अपनी दादी की हिम्मत को याद करती हूं. मुझे याद आता है वो किस तरह हर मुश्किल से लड़ते हुए भी जीती रहीं. उन्होंने मुझे सिखाया था कि हिम्मत ही आजादी की ओर पहला कदम है.

ये स्टोरी रंबलिंग रिपोर्टर  की है , यहाँ पर जो लिखा गया है वो उसका हिंदी अनुवाद है

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