पुण्यतिथि विशेष: एक गरीब परिवार का बच्चा कैसे बन गया भारत का प्रधानमंत्री

पुण्यतिथि विशेष: एक गरीब परिवार का बच्चा कैसे बन गया भारत का प्रधानमंत्री

Lal Bahadur Shastri 52nd Death Anniversay : बचपन में दोस्तों के साथ एक लड़का गंगा नदी के पार मेला देखने गया. शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो उसने नाव के किराए के लिए जेब में हाथ डाला. जेब में एक पाई भी नहीं थी. तो वहीं रुक गया. और अपने दोस्तों से कहा कि वह थोड़ी देर और मेला देखेगा. लेकिन दोस्त नहीं रूके और नाव में बैठकर नदी पार चले गए. जब उनकी नाव चली गई तब उस लड़के ने अपने कपड़े उतारकर अपने सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया. उस समय नदी उफान पर थी. बड़े-से-बड़ा तैराक भी नदी पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था. पास खड़े मल्लाहों ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की.

लेकिन उस लडके ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा. रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वे रुका नहीं. कुछ देर बाद वह सुरक्षित दूसरी ओर पहुंच गए. दरअसल वे नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े. उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था.

ये लड़का कोई और नहीं भारत के दूसरे प्रधानमंत्री और ‘भारत रत्न’ लाल बहादुर शास्त्री जी थे. आज शास्त्री जी की 52वीं पुण्यतिथि है.

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शास्त्री जी के बारे में एक और कहानी है. बचपन में एक बार शास्त्री जी खेल-खेल में एक माली के बाग और बच्चों के साथ फूल तोड़ने गए थे. इस दौरान माली ने बच्चों को देख लिया. 6 साल की उम्र के होने की वजह से वे पकड़े गए और माली ने उन्हें पीट दिया. शास्त्री जी ने माली से कहा कि मैं बिना बाप का बच्चा हूं इसलिए मुझे पीट रहे हो. इस पर माली ने कहा कि पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है.

शास्त्री जी ने इसके बाद जीवन भर अपनी जिम्मेदारियों को उठाया. ललिता शास्त्री के साथ अपनी शादी में उन्होंने दहेज के रूप में सिर्फ एक चरखा और खादी के कुछ कपड़े ही लेना स्वीकार किया था. शास्त्री जी जाति-प्रथा के खिलाफ थे. इस वजह से उन्होंने कभी भी अपनी जाति के सरनेम को अपने नाम में नहीं लगाया. उनके नाम के साथ लगा ‘शास्त्री ‘ उन्हेंफ काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है.

शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 2 अक्टूबर, 1904 को शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर हुआ था. उन्होंने 11 जनवरी, 1966 को उज़्बेकिस्तान के ताशकंद में अंतिम सांस ली थी. उसी दिन उन्होंने ताशकंद घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे. वह पहले व्यक्ति थे, जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा गया था. उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता.

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उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे उच्च विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें. घर पर सब उन्हें नन्हे के नाम से पुकारते थे. वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था.

बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे. वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए. लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था.

गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे. उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था. उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं. उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे. लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था. उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ हैं.

लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए. यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए. विद्या पीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया.

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1927 में उनकी शादी हो गई. उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था. उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी. दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे. वे दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे.

1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की. इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी. लाल बहादुर शास्त्री विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए. उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे. आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया.

आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई, उससे पहले ही राष्ट्रीय संग्राम के नेता विनीत एवं नम्र लाल बहादुर शास्त्री के महत्व को समझ चुके थे. 1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो इस ‘छोटे से डायनमो’ को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया. उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए. कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई.

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वे 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे. उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी. एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी. रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा; “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ. यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ.”

अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया. 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था.

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तीस से अधिक वर्षों तक अपनी समर्पित सेवा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता के लिए लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गए. विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा. वे दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये. लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे. अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है.” महात्मा गांधी के समान विचार रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं.

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