देवी का ‘पीरियड’ प्रसाद और किसी लड़की का ‘पीरियड’ छी ..

देवी का ‘पीरियड’ प्रसाद और किसी लड़की का ‘पीरियड’ छी ..

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर एक मंदिर स्थ्ति है। ये मंदिर गुवाहाटी की नीलांचल पहाड़ियों में स्थित है। इस मंदिर का नाम कामाख्या मंदिर है। कामाख्या एक ऐसा मंदिर है जिसके गर्भगृह में मूर्ति नहीं, एक पत्थर की पूजा होती है, जिसे देवी की योनि माना जाता है. जिसके ऊपर से एक प्राकृतिक फव्वारा निकलता

22 जून से मंदिर में अंबूबाची पर्व शुरू हो चुका है.विशाल मेले को कामरूपों का कुंभ भी कहा जाता है। इसमें देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के ज्योतिषी, साधु और तांत्रिक हिस्‍सा लेते हैं। शक्ति के ये उपासक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची’ मेले’ के दौरान  कामाख्या रजस्वला होती हैं।

‘अम्बूवाची’ पर्व

कामाख्या मंदिर की देवी को माहवारी होती है। देवी को होने वाली इस सालाना माहवारी का भक्त पूरे साल इंतज़ार करते हैं। 4 दिन तक मंदिर बंद रहता है और कोई भी देवी के दर्शन नहीं कर सकता। मंदिर की देवी की अनुमानित योनि के पास पुजारी साफ़-नए कपड़े रखते हैं, और 4 दिन बाद ‘खून’ से भीगा यह कपड़ा भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है।

इस कपड़े का प्रसाद में मिलना बड़ी क़िस्मत की बात मानी जाती है और इसलिए इसे लेने-मांगने की चाह वालों की तादाद भी काफ़ी ज़्यादा होती है। डिमांड के हिसाब से सप्लाई के लिए कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को यह माहवारी वाला दिव्य प्रसाद नसीब हो सके।

कामाख्या मंदिर में भक्त

कलिका पुराण’ में शिव की युवा दुल्हन और मुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति को कामाख्या कहा गया है। ऐसी कथा हैं कि समाधिस्थ भगवान शिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जागने पर भगवान शिव ने उसे भस्म कर दिया था।

भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत पर देवी शक्ति के जननांगों और गर्भ से कामदेव को भगवान शिव के श्राप से मुक्ति थी और उन्हें पुन नया जीवनदान व एक नया सुन्दर रूप मिला था, इसीलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से प्रसिद्द हुआ। कहा जाता है कि नया रूप पाने के बाद कामदेव ने ऋषि विश्वकर्मा से इस मंदिर का निर्माण कराया था और इसका नाम आनंदाख्य मंदिर रखा था, जो आगे चलकर कामाख्या हो गया।

संस्कृत भाषा में काम शब्द का अर्थ है प्रेम और इंगलीश में SEX 

ऐसी भी मान्यता हैं कि इसी स्थान पर देवी सती और भगवान शिव के बीच प्रेम की शुरुआत हुई थी। उसी समय से ही यहाँ कामाख्या देवी की मूर्ति को रखा गया और उसकी पूजा शुरू हुई। पोराणिक मान्यता के अनुसार अपने पिता दक्ष के यज्ञ में शरीर-दहन करने वाली देवी सति के मृत देह का योनि भाग यहाँ पर गिरा था, इसलिए इस जगह पर सति यानि शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहां पर देवी-देवताओं की मूर्तियां सिंहासन पर रखी हुई हैं।

 मंदिर

मंदिर के भीतरी भाग से गर्भ-गृह की ओर जाने वाला एक संकरा रास्ता है, जिसे प्रद्क्षिणा-पथ भी कहते हैं। सीढयों से होकर नीचे गर्भ गृह में जाया जाता है। गर्भगृह में देवी की कोई मूर्ति नहीं है। वहां पर योनि के आकार का एक शिलाखंड है, जिसके ऊपर लाल रंग की गेरू के घोल की धारा गिराई जाती है। देवी का यह प्रतीक स्वरुप अंग हमेशा लाल कपड़े से ढ़्का रहता है।

उस शिलाखंड के पास ही धरती में भीतरी योनि की आकृति की एक दरार है, जिससे एक फव्वारे की तरह जल निकलता है। श्रद्धालु उस जल को दिव्य मानते हुए उसकी पूजा करते हैं।

माना जाता है कि देवी को हो रही माहवारी के कारण ही ब्रह्मपुत्र का पानी भी उन 4 दिनों के लिए लाल हो जाता है। इस बारे में कई अफ़वाहें भी हैं। कई लोगों का मानना है कि मंदिर के पुजारी ख़ुद ही घटना का वज़न बढ़ाने के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी में हर साल इस दौरान रंग डाल देते हैं। ख़ैर, जो भी हो इतना तो तय है कि देवी के खून से सने कपड़ों से लेकर ब्रह्मपुत्र के पानी तक, लोग श्रद्धा से ख़ुद को बेहद ख़ुशक़िस्मत मानकर देवी की माहवारी का जश्न मनाते हैं।

अपने देश में अंधविश्वास की सीमा सोच पाना,  सीमा से परे है । मतलब, जरा सोच कर देखिए…जहां एक ओर लोगों से कहा जाता है कि ‘देवी की योनि से निकले खून’ को माथे से लगाओ, उनकी भक्ति में झूमो, वहीं असल जीवन में पीरियड पर बात करना भी गंदी बात में आ जाता है

बताते चले अभी हाल में एक फिल्म आयी थी,‘फुल्लू’ जिसके  डायरेक्ट अभिषेक सक्सेना है। इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने ‘अडल्ट’ सर्टिफिकेट दे दिया।

A’ सर्टिफिकेट  की वजह से अभिषेक को फिल्म के प्रमोशन में काफी दिक्कतें आयी. सोशल मीडिया के अलावा वो अपनी फिल्म को खुल के प्रोमोट नहीं कर पाए

अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हमारा ‘देश’ कितना बढ़ रहा है, और किस ‘दिशा’ में बढ़ रहा है..

फिल्म का ट्रेलर

vibhav shukla

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